निदेशक महोदय का ६९ वें गणतंत्र दिवस पर संदेश

         मैं भारत के ६९ वें गणतंत्र दिवस पर आप सभी संकाय सदस्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों, प्रिय विद्यार्थियों, सुरक्षा कर्मियों तथा सभी भारतवासियों को बहुत-बहुत बधाई देता हु।

मित्रों आज हमारी पहचान हमारी अस्मिता यह है कि हम एक आजाद देश के नागरिक है और हमारा देश का संचालन एक लोकतांत्रिक मूल्यों के आधारपर बने संविधान से होता है। यदि आज से १०-२०  वर्षों के बाद जब हम अपने स्थायी परिसर में होंगे और तब कोई हमसे पूछें कि हम वर्ष २०१७  में क्या थे। हम किस कैम्पस से आईआईटी चला रहे थे तब किसी को भी यह विश्वास नहीं होगा कि हम एक साथ तीन कैम्पस से इस आईआईटी को संचालित करते थे। हमारे छात्र एक ही दिन कुछ कक्षाएं एक कैम्पस में तो दूसरी कक्षाओं के लिए दूसरे कैंम्पस में जाते थे। इस विद्यार्थियों कि तरह ही हमारी फैकल्टी भी इस प्रकार से कक्षाओं को चलाती थी। हमारे दो ट्रांजिट परिसर में कई असुविधाओं का हमने सामना किया। यह सब बातों पर किसी का भी विश्वास नहीं होगा। मित्रों उसी प्रकार जब हमे आजादी मिली थी तब कई पाश्चात्य चिंतकों का यह मत था कि यह देश अपने आप को एक देश के रुप में कैसे स्थापित करेगा जिसमें कई बोलियां है, भाषाएं है, धर्म है, जातियां है और संस्कृतियां है। किंतु हमारे लोकतंत्र के संस्थापकों ने यह साहसी स्वप्न देखा और इसे पूरा करने का दृढ निश्चय किया जिसकी कल्पना भी तब करना बड़ा ही कठिन प्रतित हो रहा था।

आज हम पूरे विश्व में एक ऐसा स्थान प्राप्त कर चुके है कि संपूर्ण विश्व को हमें संज्ञान में लेना अनिवार्य हो गया है। और यह केवल उन महान विचारकों के दृढ निश्चय का प्रतिफलन है कि हमने सौ से अधिक भाषाएं, बोलियां, जातियों और धर्मों को साथ लेकर किंतु एक लोकतांत्रिक संविधान को सबसे ऊंचा स्थान देकर एक गणतंत्र राष्ट्र की स्थापना की। जब हम स्वतंत्र हुए थे तब २५०  साल की गुलामी ने हमें आर्थिक एक प्राकृतिक दृष्या निर्धनता की स्थिति में पहुंचा दिया था। एक और हमारे सामने आर्थिक समस्या थी तो दूसरी और बहुभाषिकता, बहुसांस्कृतिकता की।  किंतु हमने इन्हीं समस्याओं को पूरे विश्व के सामने हमारी विशेषताओं के रुप में रखा। बहुभाषिकता, बहुसांस्कृतिकता और अनेकों धर्म की समस्याओं को विशेषताओं में परिवर्तित करने की यात्रा बहुत ही कठिन थी। यह संभव हुआ केवल उन लोकतांत्रिक देश के स्वप्न देखनेवालों के कारण और हर एक सामान्य नागरिक के कारण।

यह देश ध्येय, दृष्टि और राष्ट्रनीति का एक बेज़ोड उदाहरण के रुप में पूरे विश्व के समक्ष है। यह हमारा ध्येय, हमारी दृष्टि और हमारी राष्ट्रनीति ही है कि हमने वर्ष १९५० में ही यह तय कर लिया था कि इस देश को कौन चलाएगा। हमने डेमोक्रेसी का रोडमैप उसी समय तैयार कर लिया था और इसी कारण आज हम यहां है। यह देश गरीब और अशिक्षित लोगों ने खड़ा किया है और गरीब और अशिक्षित सामान्य जनता ने खड़े किए इस देश के लिए यह बड़े ही गर्व का विषय है कि विश्व आर्थिक मंच की अध्यक्षता हमारे देश माननीय प्रधानमंत्री की है।

हमारा देश इस बात का अनुपम उदाहरण है कि देश को नेता नहीं बल्कि उस देश की सामान्य जनता बनाती है।  और ऐसे देश की आईआईटी जैसे अग्रणी संस्थान की भूमिका इस परिप्रेक्ष्य में बड़ी ही महत्वपूर्ण बन जाती है। एक आम आदमी जब बाज़ार में वस्तु खरिदने जाता है तो वह उस वस्तु के मूल्य के साथ कर (Tax) भी देता है और इसी कर से हम हमारे बड़े बड़े संस्थान बनाते है। हमारी शिक्षा इन्हें सामान्य जनता के पैसे से होती है। यह संस्थान आप विद्यार्थियों पर इसलिए लाखों रुपये खर्च नहीं करता कि आप अपना भविष्य बनाकर संतुष्ट हो जाएं वह इसलिए खर्च करता है कि आप देश का भविष्य बनाएं। आप सभी छात्र कल के भारत की नींव है। विश्व में भारत को अग्रणी स्थान पर पहुंचाने का दायित्व आपका हैं। इसी दायित्व हेतु बौद्धिक मनुष्यबल के निर्माण हेतु आईआईटी जैसे संस्थानों की शुरुवात हुई। इसलिए आवश्यकता यह है कि आप अपने संतुष्टि की परिभाषा बदलें। एक छात्र होने के नाते एक संकाय होने के नाते, कर्मचारी होने के नाते आज के परिदृश्य में हमारा एक ही लक्ष्य एवं ध्येय होना चाहिए कि हम एक अग्रणी वैश्विक संस्थान बने और यही हमारा देश के प्रति योगदान होगा।

आज हमारे देश में कई ज्वलंत और महत्वपूर्ण मुद्दों में आतंकवाद भी एक अहम मुद्दा था। मित्रों आतंकवाद मेथड नही है आतंकवाद एक फिलोसोफी है। आतंकवाद यह एक मानसिकता है। हमें आत्ममंथन एवं आत्मचिंतन कर हमारे भीतर पल रहे इस आतंकवादी मानसिकता के बीजों का समूल नाश करना होगा। मैं आतंकवाद को मानसिकता इसीलिए कह रहा है क्योंकि मेरा मानना है कि हमारी मानसिकता हमारे द्वारा सृजन भी कर सकती है औ यही मानसिकता हमारे द्वारा विनाश भी कर सकती है। मेरे विचार में जो भी व्यक्ति देश की समस्याओं से विचलित नही होता, जो भी व्यक्ति इन समस्याओं पर चर्चा करना आवश्यक नहीं समझता, जो भी व्यक्ति इनके निवारण के संबंध में कोई पहल नहीं करता वह इसी आतंकवादी मानसिकता से ग्रसित है।  मैं मानता हू कि हमारे नाइलेट परिसर में कई प्रकार की समस्याएं है, असुविधाएं है। किंतु इन समस्याओं का हमें मिलजुलकर ही समाधान करना है। किंतु यह समस्याएं प्रचार से नहीं चर्चा कर मिलजुलकर कार्य करने पर ही समाप्त हो सकती है। यह हमारे उपर है कि हम समस्याओं का प्रचार करना चाहते है कि इन समस्याओं पर आंतरिक चर्चा कर निवारण करना चाहते है।

हम देश के प्रति तभी कुछ कर सकते है जब हम ईमानदारी से अपना कार्य करें। कुछ दिनों पहले एक छात्र ने मुझे ई-मेल द्वारा अनुरोध किया कि ७४  प्रतिशत उपस्थिति होने कारण मुझे छात्रवृत्ति नहीं मिल पा रही है। आप सभी को पता है कि छात्रवृत्ति पाने के लिए आपकी ७५  प्रतिशत उपस्थिति होना अनिवार्य है। उस छात्र ने मुझे यह कहा कि केवल 1 प्रतिशत उपस्थिति कम होने के कारण उसे छात्रवृत्ति नहीं मिल पा रही है। मैंने उस छात्र को यह बताया कि तुम्हारी उपस्थिति १  प्रतिशत नहीं बल्कि २६  प्रतिशत कम है। कहना का तात्पर्य यह है कि हम हमारी जिम्मेदारी को कैसे देखते है। हम सभी ने ७४  या ७५ प्रतिशत नहीं बल्कि अपना १००  प्रतिशत श्रम इस संस्थान और देश को देना चाहिए। मैं आज निदेशक के रुप में आप सभी के समक्ष अपने इन विचारों को प्रस्तुत कर रहा हू। किंतु यदि मैं अपना १००  प्रतिशत इस संस्थान को नहीं दे रहा हू तो मुझे भी आपको परामर्श और सलाह देने का अधिकार नहीं है।

मित्रों आज हमें विरोध के स्वर को भी पुनः मूल्यांकित करने की आवश्यकता है। क्योंकि विरोध यह सफलता की कूंजी नहीं है। सफलता मात्र और मात्र कर्म से ही अर्जित की जा सकती है। अतः विरोध की परिभाषा को नयी दृष्टि से गढ़ने की आवश्यकता है। हमारा कर्म ही सफलता की कुंजी है विरोध नहीं। आपको यह बात समझनी चाहिए कि आप केवल इस संस्थान में शिक्षा ग्रहण करने हेतु नहीं आए है यहां के आस-पास के समाज,समुदाय तथा लोगों की समस्याओं पर चर्चा कर उनके लिए कुछ करने आये है।

मित्रों  यह देश अपने राष्ट्रीय कोष से लाखों रुपये आपकी पढ़ाई पर खर्च इसलिए नहीं कर रहा है कि आप केवल शिक्षा ग्रहण करें बल्कि इसलिए कर रहा है कि ग्रहण की गयी शिक्षा से आप इस परिसर के इस शहर के, इस शहर के आस-पास के गावों की समस्याओं के निवारण करने हेतु योगदान दें। आज यहां पढाने वाले शिक्षकों के वेतन से एक प्रायमरी स्कूल चल सकता है तो मेरे वेतन से एक माध्यमिक विद्यालय चल सकता है। एक प्रायमरी विद्यालय और माध्यमिक विद्यालय के खर्च के समतुल्य वेतन यदि हम पा रहे है तो निःसंदेह इस देश के प्रति हमारी जिम्मेदारी अन्यों की तुलना में कई अधिक है। और यह सब तभी संभव होगा जब सबसे पहले हम अपने इस संस्थान को सशक्त बनाएं और जब संस्थान सशक्त होगा तो हम भी सशक्त होंगें।

हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री महोदय ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार रखे। जैसे कि आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और संरक्षणवाद (Protectionism)आदि। इन बातों पर हम सभी ने चिंतन करने की आवश्यकता है। मित्रों हमें आतंकवाद जैसी घृणित मानसिकता को अपने भीतर पलने नहीं देना चाहिए क्योंकि यह विनाश की ओर ले जानेवाला मार्ग है न कि सृजन की ओर। हमें विद्यार्थी के रुप में अथवा आईआईटी रोपड़ परिवार के सदस्य होने के रुप में हमारे संस्थान को आगे ले जाने के लिए प्रयास करने चाहिए। हमें अपने संस्थान के प्रति निष्ठा रखते हुए समस्याओं का निवारण करने हेतु चर्चा एवं एक-दूसरे का सहयोग का मार्ग अपनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए। माननीय प्रधानमंत्री महोदय ने जलवायु परिवर्तन पर जो बात कहीं है हमें भी इस ओर अपनी जिम्मेदारी को सुनिश्चित करना चाहिए। जलवायु संरक्षण हेतु हर एक व्यक्ति को अनुशासित होकर स्वयं के स्तर पर इसमें योगदान देने का संकल्प करना चाहिए। आईआईटी परिवार के सदस्य होने के नाते हमारे संस्थान को साफ-सुधरा रखने हेतु हरसंभव प्रयास करने चाहिए। और हमें केवल ओर केवल अपने संस्थान तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। हमारी शिक्षा तभी फलिभूत होगी जब हम इस समाज को कुछ देंगे। हमें हमारे आस-पास के समाज, समुदाय से संपर्क स्थापित करना चाहिए। उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रियाकलापों में हमारी सार्थक सक्रिय भागीदारी कैसी हो इसपर भी हमें विचार करना चाहिए। स्पष्ट रुप से कहें तो हमें हमारी परिधि को बढ़ाकर बाहर की दुनिया के साथ संपर्क साधना चाहिए साथ ही अपनी सक्रिय भागीदारी से अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करना चाहिए।

आईये हम सभी गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह प्रतिज्ञा लेते है कि हम हमारे पूरे सामर्थ्य से इस संस्थान को वैश्विक स्तर पर अग्रणी स्थान पर पहुंचाने हेतु भरसक प्रयास करेंगे और समाज, देश और देश के नागरिकों के प्रति हमारी जिम्मेदारी को सुनिश्चित करेंगे।   

जय हिंद