निदेशक महोदय का ७२ वें स्वतंत्रता दिवस पर संदेश

         मैं भारत के ७२ वें स्वतंत्रता दिवस पर आप सभी संकाय सदस्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों, प्रिय विद्यार्थियों, सुरक्षा कर्मियों तथा सभी भारतवासियों को बहुत-बहुत बधाई देता हुं। किंतु इस अवसर पर हमें उन शहिदो के बलिदान का भी स्मरण रखना चाहिये जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर हमें गुलामी की जंज़ीरों से आजाद किया। उन सभी शहिदों को मैं नमन करता हुं। साथ ही हमें कृतज्ञ होना चाहिये हमारे सेना के जवानों के प्रति जो हमारी और हमारे देश की रक्षा करने के लिए कई महिनों तक सियाचीन ग्लेशियर से लेकर समुद्री पनडुब्बियों में विपरित परिस्थितियों में रहते है। मैं देश की आजादी की लड़ाई में शहिद हुए उन शहिदों तथा इन शहिंदों के बलिदान की रक्षा करनेवाले हमारे जवानों को नमन करता हुं।

मित्रों यह पहला स्वतंत्रता दिवस है जो हम अपने स्थायी परिसर में मना रहे है। व्यक्तिगत रुप से यह मेरे लिए एक सुखद अनुभव है। यह हम सबका स्वप्न है जो आज वास्तविकता का रुप लिये हुए है। लेकिन यह केवल किसी एक व्यक्ति या समूह के कारण नहीं है बल्कि आईआईटी रोपड़ के सभी सदस्यों की कड़ी मेहनत का परिणाम है। इसके लिए आप सभी बधाई के पात्र है।

हाल ही मेंने चायना की यात्रा की। इस यात्रा के कुछ क्षण मैं आपके साथ बाटना चाहुंगा। मेरी चायना यात्रा का पहला पड़ाव थाइलैंड था। मैंने वहां पता किया कि यहां क्या देखने लायक है। मुझे बताया गया कि यहा के मंदिर देखने चाहिये। मैंने वहां बहुत सारे भगवान बुद्ध के मंदिर देखें और जब दूसरे दिन मैं एयरपोर्ट पर गया तो मैंने भगवान बुद्ध की बहुत बड़ी प्रतिमा के साथ जो देखा मैं आश्चर्य से चकित हुआ। मैने वहा समुद्रमंथन की प्रतिमा देखी जिसमें देव और दानव दोनों समुद्र से अमृत निकाल रहे है, यह दृश्य था। मेरा अगला पड़ाव चायना था। चायना मैं मैंने उनके द्वारा बनायी गयी अद्भुत संरचनाएं देखी। जितनी उनकी संरचनाएं अद्भुत है उतनी ही ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उनकी प्रभुता देखते ही पता चलती है। मुझे उस समय इस विचार ने घेर लिया कि हम अपने देश में इस दृष्टि से ओर अधिक क्या कर सकते है। मैंने वहां अलग-अलग स्थानों के फोटोग्राफ लिये थे। शाम में जब मैं अपने होटल आया तो मैंने वह फोटोग्राफ मेरी पत्नी, बेटी और मित्रों को भेजें। किंतु यह फोटोग्राफ उनतक नहीं पहुंचे। तब मैंने वहां के व्यक्ति को बुलाया और पूछा कि क्या मैंने वाइफाइ का गलत पासवर्ड तो नहीं ड़ाला है। तब उसने बताया कि यहा व्हॉटसप् पर रोक है। फिर मैंने उसे कहा कि मैंने तो फेसबुक पर भी यह फोटोग्राफ साझा करने का प्रयास किया है तब उसने बताया कि यहा फेसबुक पर भी रोक है। फिर मैंने ई-मेल के बारे में पूछा तो उसने बताया कि यहां जी-मेल पर भी रोक है।

मैं आप सबको यह घटना इसलिए बता रहा हू कि आप इन घटनाओं से कुछ समझने का प्रयास करें। जहां चायना जैसे देश में सूचना तंत्र को लेकर इतने नियम-कानून लागू है वहीं हमारा देश समर्थन और आलोचना (Support & Criticism) जैसे दो विपरित  ध्रुवों  को साथ लेकर चलने में विश्वास रखता है। जहां हमारे यहां किसी एक व्यक्ति के मत पर कई मतों का प्रकट होना स्वाभाविक है। आज भारत एक ऐसा देश है जहां हम चर्चा और विदविवाद कर सकते है, हम सहमत भी हो सकते है और असहमत भी। और यह सभी मौलिक अधिकार हमारे यहा तब है जब हमारे देश में भिन्न-भिन्न संस्कृतियां, वेशभुषा, भाषा और लिपि है। हमारी मुद्रा पर भी कई भाषाएं तथा लिपिया मुद्रित है। मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि हम अपनी तमाम भिन्नताओं के बावजूद न केवल देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार की रक्षा करते आ रहे है वहीं दूसरी ओर हमारी विभिन्न संस्कृतियों के उत्थान हेतु भी उतने ही सजग ओर तत्पर है।

ऐसा नहीं है कि हमारे यहां समस्याएं नहीं है किंतु हम इन समस्याओं का समाधान विरोध के मुखर स्वर के साथ सामजंस्य स्थापित करते हुए करने में विश्वास रखते है। अगर हम अपने संस्थान को ही देखें तो हमने हमारे इस स्थायी परिसर के निर्माण कार्य में बड़ी सी बड़ी और छोटी सी छोटी चीज पर संवाद किया है। फिर किसी भवन में कौनसा रंग देना चाहिए  या फिर डायनिंग हॉल में एसी होना चाहिये या नहीं ऐसी छोटी सी छोटी चीजों पर भी हमने बहस की है।

यहीं नहीं हमारा पाठ्यक्रम एक मौलिक पाठ्यक्रम है। इस पाठ्यक्रम के निर्माण के पीछे कोई एक व्यक्ति न होकर एक पूरी टीम है, एक पूरा समूह है। जिसने चर्चा कर, संवाद स्थापित कर, हर एक व्यक्ति के मत का सम्मान कर इस पाठ्यक्रम को बनाया है। और यहीं कारण है कि हमारा पाठ्यक्रम एक ऐसा पाठ्यक्रम है जिसे करंट सायंस (Current Science) जैसे उच्च कोटि की पत्रिका में स्थान मिला है। कहने का तात्पर्य यही है कि हमारा संस्थान हो या फिर देश हो हम सबको साथ लेकर आगे बढ़ने में विश्वास करते है।

अभी जो बात मैंने की है उसे बड़े ही सरल तरीके से समझा जा सकता है। यदि हम खाना बनाते समय बड़ी आंच पर खाना पकाते है तो वह बाहर से तो पका हुआ दिखता है लेकिन अंदर से कच्चा रह जाता है। भारत और कई अन्य देशों में यही अंतर है। हम अन्य देशों की तुलना में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में उतने विकसीत नहीं हुए हो किंतु धीरे-धीरे ही सही हम अपनी संस्कृति को साथ लेकर विज्ञान और तकनीक की दिशा में अपना एक अलग स्थान बना रहे है।

मित्रों मुझे जरा भी संदेह नहीं है कि हमारा संस्थान देश का एक अग्रणी संस्थान होगा।  इस विश्वास का कारण यह है कि यहां के छात्र दिन में कुछ समय नाइलेट परिसर में होते है तो दूसरे समय पारगमन परिसर में तो उसके बाद स्थायी परिसर में। उन्हें हो रही इस कठिनाईयों के बावजूद वे  बड़ी लगन से अपना कार्य कर रहे है। अगर मैं फैकल्टी की बात करु तो आज कुछ फैकल्टी के पास बैठने तक की जगह नहीं है। उनके अनुसंधान उपकरण बरामदे में पड़े होते है। फिर भी वे अपने शिक्षक के दायित्व का पूर्ण निष्ठा के साथ निर्वाहन कर रहे है। अगर मैं गैर शैक्षणिक स्टाफ के बारे में कहू तो यहां का हर एक व्यक्ति बड़ी ही लगन के साथ समय की चिंता न करते हुए अपने दायित्व का निर्वाहन कर रहा है। और आज इसकी का परिणाम है कि आईआईटी रोपड़ ने पिछले दस वर्षों में अतुलनीय प्रदर्शन किया है।  आप सभी की मेहनत का ही फल है कि आज देश-विदेश की बड़ी-बड़ी कंपनियों तथा संस्थानों के साथ हम जुडें है, इनके साथ हम सहयोगात्मक अनुसंधान कार्य कर रहे है, हमारे छात्र और संकाय अपनी शोध प्रस्तुति हेतु इन संस्थानों की यात्रा कर रहे है। हमारी यह उपलब्धियां इस बात का प्रमाण है कि हम सब सहयोगी विकास (Co-operative development ) में विश्वास रखते है। आप सभी के इस सहयोगी विकास के बिना यह संभव नहीं था। आज स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य पर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी इस तथ्य की ओर संकेत किया कि मक्खन पर लकीरें खींचना आसान है, पत्थरों पर लकीरें खींचना कठिन है।

इन तमाम बिंदूओं को आपके समक्ष रखने का यत्न मैंने इसीलिए किया कि हमारा देश सभी को साथ लेकर विकास करने में विश्वास रखता है। और मित्रों जब किसी एक विचार के साथ कई लोग जुड़ते है तब हम केवल विचार को ही साथ लेकर नहीं चलते अपितु कई भाषाएं, वेशभुषाएं, खान-पान और संस्कृतियों को साथ लेकर चलते है।

जब जब मुझे आप सभी से संवाद करने का अवसर मिला है तब-तब मैंने आप सभी से यह आग्रह किया है जो मैं आज पुनः करना चाहुगां कि आप सभी नवाचार (Innovative) पर अपना ध्यान केंद्रित करे। इस संस्थान के हर एक सदस्य ने अपने-अपने कार्य में कुछ नयीं तकनीक और विचारों को लाना चाहिये। फिर वह प्रशासनिक कर्मचारी हो, संकाय सदस्य हो या फिर विद्यार्थी हो। विशेष रुप से मैं विद्यार्थियों से कहना चाहुंगा कि उत्तीर्ण होने पर उपाधि तो आपको मिलनी ही है। आपको नौकरी भी मिल ही जायेगी। लेकिन अपने इस विद्यार्थी जीवन में आपने तकनीक के क्षेत्र में कुछ नये आयामों को लेकर सोचना चाहिये। आपने कुछ ऐसा करना चाहिये जो अब तक किसी भी आईआईटी ने नहीं किया है। यह आपकी नयी सोच ही होगी जो आपको तथा इस संस्थान को न केवल उत्कृष्ट बनायेगा अपितु एक अग्रणी संस्थान के रुप में प्रतिष्ठित करेगा।

पैसा कभी संस्थान का निर्माण नहीं कर सकते। अगर ऐसा होता तो कई निजी संस्थान जिनके पास पैसे की कमी नहीं है वे आज बड़े बड़े संस्थानों के रुप में जाने जाते। मित्रों आपकी नवोन्मेष कल्पनाएं/सोच (innovative ideas) ही एक ऐसी चीज है जो इस संस्थान को न केवल उत्कृष्ट बनायेगी अपितु भारत के एक अग्रणी संस्थान के रुप में प्रतिष्ठीत करेगी।

आईये हम सभी स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यह प्रतिज्ञा लेते है कि हम हमारे पूरे सामर्थ्य से इस संस्थान को वैश्विक स्तर पर अग्रणी स्थान पर पहुंचाने हेतु भरसक प्रयास करेंगे और समाज, देश और देश के नागरिकों के प्रति हमारी जिम्मेदारी को सुनिश्चित करेंगे।   

जय हिंद