निदेशक महोदय का 72 वें गणतंत्र दिवस पर निदेशक का संदेश

  मैं भारत के 72वें गणतंत्र दिवस पर आप सभी संकाय सदस्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों, प्रिय विद्यार्थियों, सुरक्षा कर्मियों तथा सभी भारतवासियों तथा भारतमाता के उन सपूतों को भी  बहुत-बहुत बधाई देता हूं जो इस देश के बाहर रहते हैं और जिनके हृदय में भारतमाता वास करती हैं।  

आज ही के दिन हम सभी ने अपने इस महान देश के लोकतांत्रिक संविधान को आत्मसात और आत्मार्पित किया था। हम सभी जानते है हमारे संविधान ने एक लोकतांत्रिक देश के संविधान के नाते हमें बहुत से मौलिक अधिकारी दिए हैं। किंतु सोचने की बात यह है कि यह लोकतंत्र का स्फुटन कहां से होता है? लोकतंत्र न ही पीढ़ियों से आता है और न हीं यह जबरदस्ती थोपा जाता है। लोकतंत्र उन वैचारिक दृष्टि से संपन्न लोगों से आता है जो देश को योग्य दिशा देने की असाधारण क्षमता रखते है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर एक ऐसे ही असाधारण क्षमता के धनी थे, जिन्होंने इस देश के संविधान का निर्माण किया। लेकिन डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी संविधान के निर्माण में अपनी अलग-अलग दृष्टि और विचार रखते थे। जहां महात्मा गांधी जाति-व्यवस्था में निहित कुछ पक्षों में सुधार के साथ इसे रखने के पक्षधर थे वहीं डॉ. आंबेडकर जाति-व्यवस्था के समूल निर्मुलन के पक्षधर थे। भारत के इन दोनों महान नेताओं के इस वैचारिक भिन्नता से ही इस देश के लोकतंत्र की शुरुवात हुई है।  इस दोनों नेताओं के संदर्भ में हमें यह बात विशेष रुप से समझ लेनी चाहिए कि संविधान-निर्माण की प्रक्रिया और उस दौर में यह दोनों नेता सीधे तौर पर एक-दूसरे को संबोधित नहीं कर रहे थे बल्कि अपनी-अपनी दृष्टि से इस देश को एक उचित दि) का कोई स्थान नहीं है। शा में ले जाना चाहते थे।

लोकतंत्र की कोई संरचना नहीं है और न हीं लोकतंत्र कोई संरचना है। लोकतंत्र यह एक संकल्पना है। लोकतंत्र यह एक ऐसी संकल्पना है जो संवाद, चर्चा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर अपना रुप ग्रहण करती है। लोकतंत्र संवाद सम्मिलित चर्चा है जिसमें हिंसक उपायों (VIOLENT MEASURES) का कोई स्थान नहीं है।  

लोकतंत्र अर्थात देश के नागरिकों के बीच संवाद है। यह वह संवाद है जो गरीब और अमीर के बीच का संवाद है, शिक्षित और अशिक्षित के बीच का संवाद है, सुविधासंपन्न और वंचितों के बीच का संवाद है।

हमारे देश की लोकतांत्रिक देश बनने की नींव में मत-मतांतर की लंबी परंपरा है। हमने तीन दिन पहले हमारे महान स्वतंत्रता सेनानी श्री सुभाष चन्द्र बोस जी की 125वीं जयंतीमनायी। हम सभी जानते है कि श्री सुभाष चन्द्र बोस और महात्मा गांधी के बीच भी कई मुद्दों पर वैचारिक भिन्नता थी। किंतु चाहे वह सुभाष चन्द्र बोस हो, डॉ. भीमराव आंबेड़कर हो, महात्मा गांधी हो ,इन सभी का लक्ष्य एक ही था।

यदि लोकतंत्र आत्मा है तो इसका मार्ग क्या है?  लोकतंत्र के चार स्तंभ हैः- 1) विधायिका, 2) कार्यपालिका, 3) न्यायपालिका और 4) पत्रकारिता। यदि आप ध्यान से देखेंगे तो यह पाएंगे कि मुख्य रुप यह चारों स्तंभ एक-दूसरे के साथ परस्पर संबंध रखते हैं। एक स्तंभ की त्रृटि की पूर्णता शेष चार स्तंभ करते हैं। मेरी दृष्टि में इसमें एक और स्तंभ है और वह है वैचारिक दृष्टि से संपन्न समाज। मेरा यह स्पष्ट मत है कि यदि आपके पास धरातल पर लोकतंत्र नहीं है तो कोई भी राष्ट्र एक लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं बन सकता। एक वैचारिक दृष्टि से संपन्न समाज इसी धरातल का कार्य करता है।

जैसा कि मैंने पहले भी इस बात का उल्लेख किया है कि लोकतंत्र अर्थात संवाद, चर्चा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इस दृष्टि से यदि हम हमारे संस्थान को देखें तो हमने अब तक 190 से अधिक अधिष्ठाता बैठकें, 50 से अधिक विभागाध्यक्षों की बैठकें,30 से अधिक प्रशासनिक प्रमुखों की बैठकें और 89 से अधिक परियोजना निगरानी समूह (PMG)की बैठकों का सफलतापूर्वक आयोजन किया है। इन विभिन्न स्तरों पर हुई इन बैठकों का औचित्य और निष्षत्ति क्या है? इस प्रश्न का एक ही उत्तर है, आई.आई.टी. रोपड़ के इस भव्य परिसर का निर्माण। लेकिन यह बैठकें केवल एक औपचारिका भर नहीं थी अपितु इन बैठकों में समय-समय पर हम सभी ने अपनी सहमति, असहमति व्यक्त की। कई बार ऐसा भी हुआ कि मेरे द्वारा प्रस्तावित कई मुद्दों पर आप सहमत नहीं थे। किंतु हम सभी ने एक-दूसरे के साथ संवाद स्थापित कर, चर्चा के माध्यम से इस संस्थान के हित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिए और इस संस्थान के निर्माण में अपनी-अपनी भूमिका निभाई। यहीं इस राष्ट्र के लोकतांत्रिक मूल्य है। संस्थान का यह नवनिर्मित परिसर इन बैठकों में आपकी सक्रिय सहभागिता और बैठकों के निर्णयों पर आप सभी के द्वारा अपनी-अपनी भूमिका का पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण भाव से निर्वहन का सुखद प्रतिफल है।

मैं इस बात का विशेष रुप से उल्लेख करना चाहुंगा कि हमारी कई वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद, जब-जब इस संस्थान पर किसी भी प्रकार का संकट आया है जैसै कि बाढ़ हो अथवा कोरोना महामारी का समय हो, हम सभी की असहमतियां एकता में परिवर्तित होती हुई दिखी हैं। सामान्य परिस्थितियां हो अथवा आपदा का समय हो, हम सभी ने संस्थान के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन किया यहीं लोकतंत्र है, हम सभी ने एक साथ आकर इस संस्थान को बनाया यहीं लोकतंत्र है, और यहीं इस संस्थान की संस्कृति है।

लोकतंत्र यह पन्नों पर नहीं होता बल्कि लोकतंत्र उसके द्वारा बनायी गयी तमाम संस्थाओं से स्वयं को जीवित रखता है और अधिक समृद्ध बनाता है। अतः इस दृष्टि से आई.आई.टी जैसे संस्थान अपना एक विशेष महत्व रखते हैं। आई.आई.टी संस्थान यह गुणवत्ता-प्रधान और अनुसंधान उन्मुख संस्थान है जो संवाद, चर्चा और सहयोग से स्वयं को अन्य संस्थानों से अलग बनाते है। हम हमारे संस्थान में केवल अनुसंधान नहीं करते बल्कि इस देश को नई संकल्पना, नए सिद्धांत, नए उत्पाद, नया विज्ञान और नई प्रौद्योगिकी देते हैं।

लेकिन मित्रों, हमारा गंतव्य इन अनुसंधान की सफलता अथवा भव्य भवनों का निर्माण मात्र नहीं है अपितु उत्कृष्ट मनुष्य और समाज का निर्माण करना है।  मैं आशा करता हूं कि आई.आई. टी. रोपड़ केवल भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के अग्रणी संस्थानों में अपना स्थान और भागीदारी सुनिश्चित करेगा।

भारत माता की जय

वन्दे मातरम्

जय हिंद